Thursday, 4 December 2008

Fahmida Riaz poem-Bhagat Singh ki Moorat



भगत सिंह की मूरत
- : फहमीदा रियाज
दिल्ली से खबर आई है
दुहाई है दुहाई है
पार्लिमेंट काम्पलेक्स में
शहीद भगत सिंह की
सरकारी शिल्पकार ने
यह कैसी छवि बनाई है!
अरे हाय हाय
यह तो भगत सिंह नहीं
वो केसरी गबरु हमारा
जिस की देको जला न पाए थे ठीक से
साठ पैंसठ वर्ष का मोटा कापा सा
मोटी मूँछ वाला
यह तो कोई और है
साठ वर्ष से कोशिश कर रहे थे
धर पटीशन पर पटीशन
अंग्रेजों ने ठुकराया
तुम तो मत ठुकराओ
भगत सिंह शहीद की
मूरत यहाँ लगाओ
आखिर साठ वर्ष बाद सरकार ने
छाती पर हाथ मारा और कहा
हाँ क्यों नहीं !”
और लगा दी मूरत पार्लिमेंट कम्पलेक्स में
हैं ! यह क्या ?
यह तो भगत सिंह नहीं
हा ! हा ! हा ! प्यारे मित्रों
रोना बंद करो
जरा इस पार्लिमेंट में दूसरी मूरतों को
भी गौर से देखो
क्या यह वही जवाहरलाल है जो वह था
वही गांधी है ?
वही अबुल कलाम आज़ाद ?
इनकी असल सूरत और आत्मा
तो इस पार्लियामेंट में आने जाने वाले
कब की आमलेट बनाकर खा पी चुके
इस अंधेरे में केवल
बदली हुई मूर्तियां ही लग सकती है
कूजा भगत सिंह
वो अब बाकी नहीं रहा
उसका ज़माना बीत गया
वो जो ग़ालिब का आशिक था
और आँख मार-मार कर ग़ल गा रहा है
ऐश्वर्या राय जिस पर नाच रही है
उनकी मेहरबानी
और उसके शहर लाहौर में
भगत सिंह एक सिख है, ज्यादातर लोगों के लिए
जो शायद सन सैंतालीस में
वहाँ से चला गया
ऐसे नाम सुनकर लोग घबरा जाते हैं
कम्बख्त कहीं वापिस तो नहीं आ रहा है
अपनी प्रापर्टी क्लेम करने
नहीं, नहीं, हम ऐसा नहीं होने देंगे
आखिर हम भी तो छोड़ कर आए हैं
ख़ेत खलिहान दुकानें मकान
लुधियाने में
क्यों तुमने चाहा उसकी मूरत लगाना
पार्लिमेंट कम्पलेक्स में ?
भगत सिंह सरकार का हीरो नहीं बन सकता
किसी भी सरकार का नहीं
वो खालिस हिंदुस्तानी था
उसका समय बीत गया
वो खालिस हिंदुस्तान की मिट्टी का गीत था
पानी की चमक
हवा की सरसराहट
खालिस हिंदुस्तानी जोश और ज़ज़्बा अपने वक्त का
हवा उस वक्त को उड़ा ले गई
उसकी मूरत वहीं लगी रहने दो
सरहद के इस पार और उस पार
इक्का दुक्का दिल में
हर सुबह बच्चों जैसी मासूम कामनाएं
उसके कोरे पिंडे को गेंदे के फूलों से ढांप देती हैं
और उसको सहलाती हैं
प्यार और सम्मान भरे आँसुओं के नमकीन पानी से
यह है उसका असल स्थान
भगत सिंह यहाँ खु


2 comments:

madhur said...

great work sir !

Shafiqur Rahman khan yusufzai said...

bahut khubsurat

royen khade hogaye padke! bhav me shabd nahi dhaal sakta